किसी भी जीवंत और स्वस्थ लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसका युवा वर्ग होता है। जब देश की राजधानी नई दिल्ली में अपने बुनियादी अधिकारों, पारदर्शी व्यवस्था, रोजगार और शिक्षा से जुड़े सवालों को लेकर सड़कों पर उतरने वाले युवाओं को प्रतिबंधों, बैरिकेड्स और पुलिसिया घेराबंदी का सामना करना पड़े, तो यह स्थिति लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर विमर्श की मांग करती है। राजधानी के प्रमुख स्थलों पर धारा 144, इंटरनेट पाबंदियां और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की धरपकड़ जैसे दृश्य आम जनता के मन में यह सवाल खड़ा करते हैं कि आखिर यह नौबत क्यों आई और क्या यह इमरजेंसी जैसे हालात की आहट है?

संवाद की जगह पाबंदियों का रास्ता क्यों?

भारत का संविधान हर नागरिक को अनुच्छेद 19 के तहत शांतिपूर्ण रूप से एकत्रित होने और अपनी अभिव्यक्ति दर्ज कराने का मौलिक अधिकार देता है। दिल्ली केवल सत्ता का केंद्र नहीं है, बल्कि वह पूरे देश की चेतना का प्रतिनिधित्व करती है। दूर-दराज के राज्यों से आया छात्र या युवा जब अपनी बात रखने संसद या जंतर-मंतर की ओर रुख करता है, तो उसका उद्देश्य अराजकता फैलाना नहीं, बल्कि हुक्मरानों तक अपनी व्यथा पहुंचाना होता है।

 

विडंबना यह है कि प्रशासन अक्सर कानून-व्यवस्था और यातायात का हवाला देकर इन आवाजों को पहले ही रोक देने की रणनीति अपनाता है। जगह-जगह अवरोधक खड़े करना, मेट्रो स्टेशनों के गेट बंद करना और युवाओं को हिरासत में लेना किसी स्थायी समाधान का संकेत नहीं है। जब नीति-निर्माता और प्रशासनिक तंत्र युवाओं के साथ सीधे संवाद के बजाय सख्ती का रास्ता चुनते हैं, तो यह व्यवस्था की प्रशासनिक कमजोरी को उजागर करता है।

इमरजेंसी जैसे हालात का आभास

​इतिहास गवाह है कि जब-जब असहमति की आवाजों को दबाने के लिए अत्यधिक प्रशासनिक बल का प्रयोग किया गया, तब-तब व्यवस्था निरंकुशता के घेरे में आई है। जब युवा:
​पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं पर न्याय मांगें,

कोचिंग संस्थानों व हॉस्टलों की बुनियादी सुरक्षा और छात्र हितों की मांग उठाएं,

​या बेरोजगारी और नीतियों पर शांतिपूर्ण मार्च निकालना चाहें,
​तब उन्हें सुनने और उनकी चिंताओं का निवारण करने के बजाय सीमाओं पर ही रोक देना या हिरासत केंद्रों में भेज देना असंतोष को कम नहीं, बल्कि कई गुना बढ़ा देता है। सवाल यह उठता है कि एक स्वतंत्र राष्ट्र की राजधानी में युवाओं के शांतिपूर्ण जमावड़े से आखिर व्यवस्था इतनी असहज क्यों हो जाती है?

समाधान का मार्ग: संवेदनशीलता और पारदर्शी जवाबदेही

संवाद को प्राथमिकता: सरकार और संबंधित विभागों को छात्र व युवा संगठनों के प्रतिनिधियों से समय पर बात करनी चाहिए ताकि असंतोष सड़कों पर तनाव का रूप न ले।

कानूनी अधिकारों का सम्मान: सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का दायित्व है, परंतु सुरक्षा के नाम पर लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता।  

नीतिगत सुधार: युवाओं के मुद्दे केवल तात्कालिक विरोध प्रदर्शन नहीं होते; वे देश के भविष्य से जुड़े होते हैं। भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता, जवाबदेह प्रशासन और समयबद्ध रोजगार नीति ही स्थायी शांति ला सकती है।  

देश का युवा यदि सवाल पूछ रहा है, तो यह लोकतंत्र के जागृत होने का प्रमाण है। राजधानी को छावनी में बदलने की प्रवृत्ति न तो राष्ट्रहित में है और न ही लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप। शासन का कर्तव्य युवाओं पर पाबंदियां लगाना नहीं, बल्कि उनके भविष्य को सुरक्षित और भयमुक्त बनाना है।

 

By Leela Dhar Chauhan

LeelaDhar Chauhan (9459200288) MD/Chief Admin AAS 24news email-leeladhar9@gmail.com

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