हिमाचल प्रदेश के वन क्षेत्रों में घातक खरपतवारनाशी ग्लायफोसेट (Glyphosate) के अंधाधुंध प्रयोग और उसके बाद मटर की अवैध खेती के मामलों ने प्रदेश में गंभीर पर्यावरणीय और कानूनी चिंता खड़ी कर दी है। इस मुद्दे को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं, पूर्व अधिकारियों, वैज्ञानिकों और जनप्रतिनिधियों के एक बड़े समूह ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को कड़ा ज्ञापन भेजते हुए तत्काल प्रतिबंध और सख्त कार्रवाई की मांग उठाई है।
ज्ञापन में कहा गया है कि मंडी जिला के नाचन वन मंडल की थाची रेंज में हाल ही में वन विभाग द्वारा अवैध मटर फसल उखाड़ने की कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन यह समस्या केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। आशंका जताई गई है कि प्रदेश के कई ऊंचाई वाले वन क्षेत्रों में इसी तरह ग्लायफोसेट का छिड़काव कर जंगलों को साफ कर अवैध खेती की जा रही है, जो पिछले कुछ वर्षों से लगातार बढ़ रही है। ज्ञापन में स्पष्ट किया गया है कि यह गतिविधियां वन (संरक्षण) अधिनियम 1980, भारतीय वन अधिनियम 1927 और जैव विविधता अधिनियम 2002 का सीधा उल्लंघन हैं।

गंभीर खतरे की चेतावनी
हस्ताक्षरकर्ताओं ने ग्लायफोसेट के खतरों पर भी विस्तार से चिंता जताई है। उनके अनुसार यह रसायन मानव स्वास्थ्य के लिए संभावित कैंसरकारक है और हार्मोन असंतुलन, किडनी व लीवर रोगों का कारण बन सकता है। वहीं पर्यावरण के स्तर पर यह न केवल खरपतवार, बल्कि पूरी वनस्पति को नष्ट कर देता है, जिससे भूमि की उर्वरता, सूक्ष्म जीव तंत्र और जंगलों का प्राकृतिक पुनर्जनन पूरी तरह प्रभावित होता है।
ज्ञापन में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि इस तरह जंगलों को रसायनों से खत्म किया जाता रहा, तो हिमाचल में भूस्खलन, भूमि कटाव और जल स्रोतों के प्रदूषण का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।
सरकार के ‘मिशन-32’ पर भी सवाल
ज्ञापन में सरकार के ‘मिशन-32’ लक्ष्य का हवाला देते हुए सवाल उठाया गया है कि जब 2030 तक वन आवरण बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है, तो दूसरी ओर जंगलों को इस तरह नष्ट होने देना कैसे उचित है।
मुख्य मांगें
ज्ञापन में सरकार से पांच प्रमुख मांगें रखी गई हैं—
– प्रदेश में ग्लायफोसेट और उसके सभी ब्रांड नामों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए
– ‘जंगल साफ करने’ के नाम पर हो रहे भ्रामक विज्ञापनों पर तत्काल रोक लगे
– वन भूमि पर अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ FIR और सख्त कानूनी कार्रवाई हो
– ड्रोन और सैटेलाइट मैपिंग के जरिए पूरे प्रदेश में विशेष जांच अभियान चलाया जाए
– विकास खंड स्तर पर ‘वन सुरक्षा एवं जनजागरण समितियों’ का गठन किया जाए
विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल
इस ज्ञापन पर हिमालय नीति अभियान, पूर्व IFS अधिकारी, वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता, अधिवक्ता और जनप्रतिनिधियों सहित 30 से अधिक हस्ताक्षरकर्ताओं ने समर्थन दिया है। इनमें पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कई प्रमुख नाम भी शामिल हैं, जिन्होंने इसे हिमाचल के भविष्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया है।
सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार
फिलहाल सरकार की ओर से इस ज्ञापन पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन जिस तरह से यह मुद्दा उठाया गया है, उससे आने वाले दिनों में इस पर सियासी और प्रशासनिक हलचल तेज होने के आसार हैं।
पर्यावरण प्रेमियों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो हिमाचल के जंगलों और पारिस्थितिकी को अपूरणीय क्षति हो सकती है।
