लोकतंत्र की आत्मा समानता के सिद्धांत पर टिकी है—कानून की नजर में सब बराबर हैं, चाहे वह किसी महल का बाशिंदा हो या फुटपाथ का नागरिक। लेकिन जब सत्ता और सियासत की चौखट से निकलकर रसूखदार घरानों के बच्चे सड़कों पर उतरते हैं, तो अक्सर यह समानता दम तोड़ती नजर आती है। तेज रफ्तार गाड़ियां, हूटर की गूंज, लाल बत्ती का अनादर और कानून के रखवालों को आंखें तरेरने का चलन आज हमारे सामाजिक ताने-बाने पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगा रहा है।
‘तू जानता नहीं मेरा बाप कौन है?’: दंभ की पहचान
जब कभी कोई नियम टूटता है और कोई कर्तव्यनिष्ठ पुलिसकर्मी चालान काटने या जांच करने की हिम्मत जुटाता है, तो अमूमन जवाब तर्कों या शालीनता से नहीं, बल्कि एक घमंड भरे सवाल से दिया जाता है—”तू जानता नहीं मेरा बाप कौन है?”
यह सवाल केवल एक उद्दंड युवक की जुबान से निकला जुमला नहीं है, बल्कि उस खोखले संस्कार की नुमाइश है जो यह सिखाता है कि कानून आम जनता के लिए है और विशेषाधिकार उनके लिए। जब बचपन से ही यह भरोसा दिला दिया जाए कि पिता की कुर्सी हर गलती को ढकने की ढाल है, तो वहां कर्तव्यबोध नहीं, असीमित अहंकार जन्म लेता है।

चौथे स्तंभ पर प्रहार: सच से घबराहट
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ यानी मीडिया जब ऐसे मामलों पर कैमरे का रुख करता है और जवाबदेही मांगता है, तो इन तथाकथित ‘साहबजादों’ का पहला हथियार धमकी, बदसलूकी या बलप्रयोग होता है। कैमरों को तोड़ना, पत्रकारों से हाथापाई करना या सत्ता की पहुंच का डर दिखाकर आवाज़ दबाने की कोशिश करना इस बात का सबूत है कि सच का सामना करने का नैतिक साहस इनके पास नहीं है। वे भूल जाते हैं कि कलम और कैमरे को दबाने से गुनाह छिपते नहीं, बल्कि सार्वजनिक पटल पर और अधिक उजागर हो जाते हैं।
विरासत में सत्ता, पर संस्कार कहां?
असली सवाल परवरिश और उन मूल्यों का है जो किसी भी परिवार की बुनियाद होते हैं। राजनीति या सार्वजनिक जीवन में सेवा, त्याग और विनम्रता की कसमें खाई जाती हैं, लेकिन घर की दहलीज पार करते ही जब अगली पीढ़ी कानून और आम जनमानस को कीड़े-मकोड़े समझने लगे, तो समझना चाहिए कि सत्ता ने विवेक का हरण कर लिया है।
विरासत में दौलत, पद और समर्थकों का हुजूम तो मिल सकता है, लेकिन आचरण और मर्यादा बाजार में या सत्ता की दुकानों में नहीं बिकती। शक्ति की असली पहचान यह नहीं कि आप कितनों को रौंद सकते हैं, बल्कि यह है कि सत्ता के चरम पर रहकर भी आप कानून और आम नागरिक के प्रति कितने विनम्र हैं।
व्यवस्था के सामने अग्निपरीक्षा
जब तक रसूखदारों के मामलों में थाने और अदालतें समझौते के रास्ते तलाशेंगी, तब तक यह बीमारी समाज को खोखला करती रहेगी। एक सशक्त राष्ट्र के लिए यह अनिवार्य है कि:
* कानून का डर सबके लिए समान हो: पद या रसूख देखकर खाकी का रवैया न बदले।
* सख्त जवाबदेही: सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधि खुद अपने बच्चों के आचरण की जिम्मेदारी लें और कानून को अपना काम निष्पक्ष रूप से करने दें।
* सामाजिक बहिष्कार: ऐसे कृत्यों को विशेषाधिकार नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध के रूप में देखा जाए।
समय का चक्र बड़ा निर्मम होता है। सत्ताएं बदलती हैं, कुर्सियां छूटती हैं और काफिले बिखर जाते हैं। अंत में वही टिकता है जो कानून और मानवता की मर्यादा में रहा हो। जो आज कानून और सच को रौंद रहे हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि इतिहास केवल पद को नहीं, आचरण को भी दर्ज करता है।
