जिला स्तरीय ख्योड मेले की सांस्कृतिक संध्याओं में स्थानीय लोक कलाकारों को दरकिनार करने और कलाकारों के चयन में बरती गई कथित मनमानी का मामला अब पूरी तरह गरमा गया है। क्षेत्र के लोकगायकों ने मेला प्रबंधन समिति और पंचायत प्रतिनिधियों की कार्यशैली पर गंभीर आरोप लगाते हुए मांग उठाई है कि जिला स्तरीय मेलों का आयोजन पंचायत प्रतिनिधियों के बजाय सीधे प्रशासनिक देखरेख में करवाया जाए।
सराज विधानसभा क्षेत्र के प्रमुख लोकगायकों बीएस भारद्वाज, देवराज, कुरमदत्त भारती और बीएस राणा सहित अन्य कलाकारों ने गहरा रोष व्यक्त करते हुए कहा कि मेले के मंच पर गृह जिले और सराज क्षेत्र की स्थापित प्रतिभाओं की पूरी तरह अनदेखी की गई। कलाकारों का आरोप है कि मेला कमेटी ने मंडी जिले के स्थानीय लोकगायकों को मंच न देकर बाहरी जिलों के कलाकारों को तरजीह दी, जो स्थानीय लोक संस्कृति और कलाकारों का खुला अपमान है। उन्होंने व्यथा व्यक्त करते हुए कहा कि यदि अपने ही गृह जिले मंडी में उन्हें सम्मान और मंच नहीं मिलेगा, तो वे कहां जाएंगे।
कलाकारों के चयन पर भाई-भतीजावाद के आरोप
लोकगायकों ने कलाकारों की चयन प्रक्रिया पर भी तीखे सवाल खड़े किए हैं। कलाकारों का कहना है कि इतने बड़े जिला स्तरीय मेले में प्रस्तुति देने वाले कलाकारों का चयन संगीत के पारखी, वरिष्ठ संगीतकारों या विषय विशेषज्ञों की समिति के माध्यम से होना चाहिए था। लेकिन अफसोस की बात यह रही कि पंचायत प्रतिनिधियों ने स्वयं या फिर अपने चहेतों के माध्यम से कलाकारों की सूची तैयार कर ली, जिन्हें संगीत और लोक विधा की बुनियादी समझ तक नहीं है। बिना संगीत की समझ रखने वालों द्वारा चयन किए जाने से योग्य कलाकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और केवल सिफारिशों को तरजीह दी गई।
पंचायत बासा के टेकचंद डोगरा ने RTI से मांगा ब्यौरा
वहीं, ग्राम पंचायत बासा के स्थानीय लोकगायक टेकचंद डोगरा ने मेला प्रबंधन पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि अपनी ही पंचायत में आयोजित कार्यक्रम में उन्हें प्रस्तुति का मौका न देकर अपमानित किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे इस अन्याय के खिलाफ चुप नहीं बैठेंगे। डोगरा ने सांस्कृतिक संध्याओं के कुल बजट, कलाकारों के चयन के मापदंड और खर्च का पूरा ब्यौरा सूचना का अधिकार (RTI) के तहत प्रशासन से मांगा है।
समस्त लोक कलाकारों ने प्रदेश सरकार और मंडी जिला प्रशासन से पुरजोर मांग की है कि जिला स्तरीय मेलों का जिम्मा पंचायत प्रतिनिधियों से लेकर सीधे प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपा जाए, ताकि चयन प्रक्रिया पारदर्शी बने, बजट में पारदर्शिता रहे और स्थानीय लोक कलाकारों के मान-सम्मान की रक्षा हो सके।
